Tuesday, November 11, 2008


आज मन कितना है विचलित, पहले कभी नहीं था इतना। न जाने क्यूँ थका -थका सा , पहले नहीं थका था जितना। उनसे कितनी बार कहा है, इनसे कितनी बार बताया। फ़िर भी उनको समझ न आया, चाहे जितनी बार बताया। यह उस उदास मन की व्यथा है, जो किसी की याद, इंतजार में थका और उदास है। यह मन आपका भी हो सकता है और मेरा भी। यदि यह आपका है तो उसे समझाइये कि हमेशा जो वह चाहता है, वह हो नहीं सकता। जो उसे चाहिए वह मिल जाए, यह भी जरुरी नहीं। यह गीता का उपदेश नहीं है कि कर्म करो, फल कि इच्छा मत करो। आज के समय में ऐसे कर्तव्य निष्ठ का मिलना मुश्किल है जो कर्म करे और फल न चाहे। यदि सबके मन कि सब बातें पुरी होने लगेंगी तो विश्व व्यवस्था गडबडा जायेगी। इसलिए अपने उदास मन को समझाने का प्रयास करें। खुश रहने कि कोशिश करें।

Wednesday, November 5, 2008

बाल दिवस पर बच्चों को लौटाएं - उनका बचपन


बच्चे मन के सच्चे , सरे जग की आंखों के तारे------ १४ नवम्बर को हर वर्ष हम चाचा नेहरू का जन्मदिन मनाते हैं। इस वर्ष उनकी ११९ वी जयंती है। मैंने निश्चय किया है की मैं एक बच्चे को बाल-मजदूरी से मुक्त करूंगी। उसे शिक्षा दिलाने का प्रयास करुँगी। यह मेरा अपना विचार है। अगर आपके विचार भी कुछ ऐसे हों तो आप भी समाज को सुधरने के इस कार्य में शामिल हो जायेंगे।

Friday, October 31, 2008

दीपोत्सव


दीप एक ऐसा जलाएं , सारा जहाँ रोशन हो जाए। बाटें खुशियाँ ऐसे, सब खुश-खुश हो जायें। दीप-पर्व ऐसा त्यौहार है जिसे हर घर में उत्साह से मनाया जाता है। हमने भी मनाया और आपने भी मनाया होगा। गणपति-लक्ष्मी की पूजा के बाद घर को दीयों से सजाकर रोशन किया, मिठाइयों का भोग लगाकर बांटा और खाया। पर क्या हमने यह सोचा की हमारे देश के कितने लोग आज भूखे रहे? नहीं न! जरा सोच कर देखें. यदि हम अपनी जरूरतों में से थोड़ा सा कम कर किसी और को देकर देखें तो एक अजीब सी शान्ति मिलेगी. यही सही मायने में पर्व का हर्षोल्लास है. सभी को दीपोत्सव की शुभकामनायें।

Thursday, October 30, 2008

प्यार

मनुष्य गलती करता है, यही तो जिंदगी है, परन्तु प्यार करना कभी भी गलती नही होता। रोमन रोलेंड

दिमाग के कारण

सारी खराबियां ख़राब मस्तिषक की उपज हैं। यदि मस्तिष्क स्वच्छ हो जाए तो क्या कोई खराबी रह सकती है। गौतम बुद्ध

Friday, October 3, 2008

दृढ़ संकल्प


आज मै सुबह जागी तो दिमाग में रात के पेंडिग पड़े काम का ध्यान आ गया। कम्प्यूटर पर चार्ट बनाने का काम अभी पूरा नही हुआ था। फ़िर आज उसे ही लेकर बैठ गई। अपना काम ख़ुद करने से एक अजीब सी संतुष्टि मिलती है। कुछ ग़लत हो जाय तो भी फिकर नही। कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है। पहले मुझे कोई गलती बताता था तो बड़ा बुरा लगता था। पर अब आदत हो गई है। रोज कुछ नया सीखने से हमारा ज्ञान बढ़ता है। एक बार की बात है। एक लड़का था। वह रोज अख़बार बांटता । वह अक्सर भूल जाता की किसके घर कौन सा अख़बार देना है। उसे अगले दिन डांट पड़ती या माह के आखिरी में मिलने वाले बिल में काफी रूपये कट जाते। अब उसे बहुत बुरा लगा। उसने उसी दिन निश्चय किया की वह सब काम ठीक करेगा। उसने पुरे एरिये की लिस्ट बनाई और दिन भर घूम कर सब अख़बारों को कन्फर्म किया की किसके घर कौन सा अख़बार देना है। जब अगले माह का बिल आया और पूरे रुपये मिले तो वह बहुत खुश हुआ। कहने का मतलब यह है की अपनी गलती समझ कर उसे सुधरने से मन खुश ही होता है.

Wednesday, October 1, 2008

भारत के बापू और लाल दोनों को नमन




कल दो अक्टूबर है। भारत के इतिहास में दो अक्टूबर का दिन विशेष महत्त्व का है। इस दिन भारत की धरती पर ऐसे दो फूल खिले थे जिन्होंने पूरे देश को ऐसी खुशबू से महकाया की आज भी हम उसे महसूस कर रहे हैं। ऋणी है हम उनके द्वारा दिए गए आजाद भारत के। उन्ही के करा। आज हम खुली हवा में साँस ले रहें हैं।

शुभ नवरात्र


नवरात्र के पावन पर्व के साथ ही गरबे की धूम शुरू हो गई। भोपाल में पिछले १५ दिनों से गरबे का जोरदार प्रशिक्षण चल रहा है। नवरात्री पर्व पर व्रत और पूजा-पाठ क भी विशेष महत्त्व है। व्रत और वो भी जब नो दिन के हो तो सबसे बड़ी समस्या होती है फलाहार की। रोज-रोज नया क्या बनाया जाय। आज बनाएँ गरम-गरम आलू बड़े और खट्टी-मीठी चटनी। आलू उबालकर छिल ले । उसमे स्वादानुसार फलाहारी नमक, बारीक़ कटी हरी मिर्च, हरी धनिया मिलकर गोले बना ले। अब एक कटोरे में सिंघाडे का आटा थोड़ा सा नमक डालकर घोल ले। घोल ज्यादा पतला या गाढा न हो। आलू के बने गुए गोलों को घोल में डुबाकर तेल या शुद्ध घी में तल लें। चटनी बनने के लिए इमली ले । इमली धोकर थोड़े से पानी में गरम करे। उसमे थोड़ा शक्कर और नमक डाले । मसलकर छिलके हटा दे। आलू बड़े के साथ खाए और खिलाएं.

Friday, September 19, 2008

आओ मिलकर पानी बचाएं


पानी की कमी निरंतर चढ़ती जा रही है। हम नहाने, कपड़े धोने, पौधे सींचने आदि में बहुत पानी बहाते हैं। कुछ लोग आँगन धोने तथा वाहन आदि धोने में भी पानी व्यर्थ बहाते हैं।इसके साथ ही नल की खुली टोंटी से भी पानी फालतू बहता पाया जाता है। कोई भी इस बारे में सतर्क नहीं है। हमारे घर तो रोज नल आ रहा है न! बाकि की चिंता क्या करें। समस्या हम सभी की है। देश हमारा है। जो भी होगा नुकसान हमारे देश का होगा। इसलिए पानी की भविष्य में होने वाली कमी को ध्यान में रखकर कम पानी फेंके। वाहनों में थोड़ा सा पानी डालकर कपड़े से साफ करें। कपड़े धोने के बाद बचे पानी से आँगन धोएं तथा पेड़ में डालें। केवल तुलसी के पौधे को छोड़कर सभी पौधों में कपड़े धोने का पानी या झूठा पानी डाला जा सकता है।कही टूटी टोंटी देखें तो बदलने के लिए कोशिश करें। नगर निगम के जल प्रदाय संकाय को सूचित करें।

Monday, September 15, 2008

अगले बरस तू जल्दी आ!


कल हमने सबके साथ मिलकर गणपति जल में विसर्जित किए। धूम-धाम से ढोल-मंजीरे बजाते हुए गणपति की प्रतिमाओं को जलविहार कराया। आरती की और जल में यह कहते हुए विसर्जित किया-- गणपति बाप्पा मोरिया, अगले बरस तू जल्दी आ। हम एक मोहल्ले के सब लोग मिलकर गणपति बिठाते हैं। रोज मिलकर आरती करते हैं, प्रसाद बांटते हैं। पूरे दस दिन बहुत अच्छा लगता है। जब-जब गणेश-उत्सव मनाया जाएगा, हमें धन्यवाद करना होगा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का, जिन्होंने यह उत्सव मना कर लोगों को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। यदि हर व्यक्ति थोड़ा सा समय निकालकर इस प्रकार मिलकर काम करे तो समाज में प्यार और भाईचारा बना रहेगा।

Wednesday, September 10, 2008

आप भी बनाए दम आलू


मीडियम साइज़ के ५-६ आलू लेकर छील लें। अपनी सुविधा के हिसाब से उन्हें चार टुकड़े कर लें या चाकू से गोद लें। कढाई में थोड़ा सा तेल डालकर आलू ब्राउन कर लें। ग्रेवी के लिए दो बड़े प्याज४-५ लहसुन की फांक, एक इंच अदरक बारीक़ पीस लें। कढाई में तेल डालकर जीरा, राइ डालें। पिसा हुआ मसाला डालकर भुने। सुखा मसाला हल्दी, मिर्ची, घनिया डालें। ब्राउन होने पर दो बड़े टमाटर पीसकर डालें। २ मिनट तेज आंच पर भूने । अब सीके आलू डालकर अच्छी तरह मिलाएं। यदि थोड़ा रसेदार चाहिए तो अध ग्लास पानी डालकर उबाल लें। हरी धनिया डालकर परोसें।

Monday, September 8, 2008

स्वास्थ्य

कहते हैं मन चंगा तो कठौती में गंगा, यदि मन स्वस्थ है तभी कोई कार्य ठीक से पुरा होता है। और मन तब स्वस्थ रहता है जब तन स्वास्थ हो। बीमार शरीर में रहने वाला मन भी बीमार ही रहता है और कोई भी काम ठीक ढंग से नही होता। इसलिए अपने मन को सदा हँसता - मुस्कुराता रखें। मन के दुरुस्त रहने से सभी काम अधिक गुणवत्ता से किए जा सकते हैं। यदि थकन ज्यादा है तो दूसरा काम शुरू करने से पहले मन को विश्राम दें। आराम की मुद्रा में लेटकर दिनभर के सबसे सुखद क्षण का ध्यान करें। अपने आप आपका मन नई sfurti से bhar जाएगा, फ़िर नया काम करने में maza भी आएगा और सफलता भी मिलेगी।

Saturday, September 6, 2008

मेरा सपना - मेरी किताबें


आज मैंने एक सपना देखा। मैं बहुत सी पुस्तकों से घिरी हूँ। न जाने क्या खोज रही हूँ। एक किताब उठाती हूँ, रखती हूँ, दूसरी किताब उठाती हूँ, फ़िर रखती हूँ। किसी के दो पृष्ठ देखती हूँ, तो किसी किताब को पूरा पलटते जाती हूँ, फ़िर रख देती हूँ। बहुत प्यारी हैं, ये किताबें मुझे। बस मैं ऐसे ही किताबों में डूबे रहना चाहती हूँ। न बोलते हुए भी सब-कुछ कह जाती हैं ये किताबें। मेरी हर समस्या का समाधान इन्हीं किताबों में मिल जाता है। दुखी होती हूँ तो किताब साथ देती हैं। भूल जाती हूँ तो किताबें याद दिला देती हैं। लिखने में भी सब से ज्यादा मदद ये किताबें ही करती हैं। जी नहीं सकती मै, इन किताबों के बिना। मेरी जिंदगी हैं ये किताबें। कोई न मिले ये किताबे मिल जायें, तो मेरा जीवन धन्य हो जाए। बिछडा हुआ साथी, भूली- बिसरी यादें, सभी को तारो-ताज़ा कर देती हैं ये किताबें। सफर का अकेलापन, रस्ते की बोरियत या लोगों की फालतू चै-चै सब से मुक्त कर देती हैं-ये किताबें। मैं अब तो सपने मैं भी इन्हीं किताबों के बीच दबी रहती हूँ। जैसे ही वक्त मिलता है, घुस जाती हूँ किसी न किसी किताब में। अब तो ये किताबें ही मेरा सपना भी हैं और हकीकत भी.

Friday, September 5, 2008

सम्मान

सम्मान पाने की चीज है, छीनने या मांगने की नहीं। फ़िर भी नहीं समझ पा रहे हैं हमलोग । अपने कार्यों के माध्यम सम्मान पाए, मांगे या छीने नहीं। सम्मान लूटने की होड़ लगी है। किसने कितने पाए। पर कैसे पाए, ये विचार करने वाले कम हैं, या शायद उनके पास इन फालतू बातों के लिए समय नहीं है। उसे सम्मान मिला, मुझे भी मिले, कौन नहीं चाहता। पर करें क्या, कोई दे ही नही रहा। मिले तो लेने को सब तैयार हैं। देखिए हर व्यक्ति की अपनी एक स्टाइल होती है, जिससे वह काम करता है, अपनी जीविका चलाता hई। उसी काम में बेहतरी लाकर वह उचित सम्मान पा सकता है। कहने का मतलब बस इतना है की आप जो भी करें, डूब कर करें। उसी से काम में बेहतरी आएगी और आप सम्मान पाने के हक़दार होंगे। अपने कार्यस्थल पर सबके चहेते बनने के लिए जी तोड़ मेहनत करना पड़ती है। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है की भूखे प्यासे रहकर काम को पूर्णता देना पड़ती है। शत्रु तो हर क्षेत्र में होते हैं। अक्सर कामचोर लोग इर्ष्या वश चुगलखोरी का रास्ता अपना कर कर्मठ लोगों के पीठ पीछे बुरे करते हैं। पर ऐसा ज्यादा दिन चल नहीं पाता। कर्मठ व्यक्ति की लगन और कार्यकुशलता शीघ्र ही उसे सम्मान का पत्र बना देती है। जलन की भावना से ऊपर उठकर देखें, की कैसे सम्मान नहीं मिलता। बस अपने कार्य को निरंतर बेहतर बनाएं।

Thursday, September 4, 2008

डॉक्टर राधाकृष्णन


डॉक्टर राधाकृष्णन का जन्म ५ सितम्बर को हुआ था। जब वे राष्ट्रपति बने और उनका जन्मदिन मनाने की बात की गई, तो उन्होंने सोचा ऐसा कुछ किया जाय जिससे यह दिन सदा के लिए यादगार बन जाय। उन्होंने कहा- यदि आप मेरा जन्मदिन मानना ही चाहते हैं, तो इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाये और देश का भविष्य बनाने वाले शिक्षकों का सम्मान करें। चूँकि वे स्वयं भी एक शिक्षक थे और जानते थे कि किस प्रकार मेहनत करके एक शिक्षक अपने विद्यार्थी को गुणवान बनता है। वह सारी खूबियाँ जो उसमे हैं, देने कि कोशिश करता है। आज भी हमारे देश में इस परम्परा का निर्वाह किया जा रहा है। स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थी अपने शिक्षकों का यथोचित सम्मान करते हैं। जिन व्यक्तियों का कल ५ सितम्बर को जन्मदिन है, उन्हें मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ।

जन्मदिन


जन्मदिन, एक ऐसा दिन जिस दिन जीव का आगमन दुनिया में हुआ। हर दृष्टि से एक महत्वपूर्ण दिन। प्रतिवर्ष हम इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। पर कोई ये नही सोचता कि उसकी हसीं जिन्दगी का एक साल कम हो गया है। केक काटते हैं, मिठाइयां बांटते हैं, पार्टी मनाते हैं। फ़िर भी ये भूल जाते हैं कि मधुर जीवन के ३६५ दिन और गुज़र गए। अब आप इस बारे में जरुर सोचें। अपने जन्म दिन के दिन कोई ऐसा काम करें कि लोग याद करे, आपको, आपके किए हुए काम को। अपनी हैसियत के अनुसार, पार्टी के बदले, भूखों को भोजन कराएँ, जरुरतमंदों को कुछ सामान दे, दूसरों को खुश रखने कि कोशिश करें।

Wednesday, August 20, 2008

पहचान

प्रतिभा की पहचान मौलिकता से ही होती है। जो जितना अपनी तरह से लिखता है, वह उतना ही प्रभावशाली होता है। दूसरो का अनुकरण करना बुरा नहीं है, परन्तु ज्यो का त्यों किसी की नक़ल करना बहुत बुरी बात है। अपने व्यक्तित्व की पहचान बनने के लिए हमें अपने कार्यों, लेखन, रहने के ढंग सभी में मौलिकता बनाकर रखनी पड़ती है। यही हमारी वास्तविक संपत्ति है। इससे हमारा व्यक्तित्व निखरता है और साथ ही आकर्षण भी पैदा करता है। इस निखर को लेन और आकर्षण पैदा करने के लिए अपनी मौलिकता को बनाए। इसे बनाना और बढ़ाना दोनों ही आसान है। अपनी शक्ति को पहचाने, मनन करें। जो भी कार्य करें, डूबकर करें। अपनी मौलिकता को कभी भी दबाने का प्रयास न करें। इससे हमारी प्रतिभा कम और ख़त्म भी हो सकती है। हर व्यक्ति में अपना अलग अंदाज़ होता है। उसे पहचानकर विकसित करे।

पर्यावरण को बनाए हरा-भरा


प्रकृति ने हमें ये दिया, वो दिया, भेदभाव नहीं किया, ये बातें लगभग हर चौथा व्यक्ति करता है। परन्तु उस प्रकृति की देखभाल और रक्षा करने की बात करने वाले चंद लोग ही होते हैं, जो पेड़ लगाकर, पेडो को काटने से बचाकर पर्यावरण को समृद्ध कर रहे हैं। हम सभी जानते हैं की पौधे लगाने और उनकी उचित देखभाल से ही हमारा पर्यावरण हरा-भरा रहेगा। फ़िर भी हम अपने लिए मकान बनाने के लिए, होटल बनाने के लिए और अन्य जरूरतों के हिसाब से पेड़ काटकर ज़मीं को खाली करते हैं और भूल जाते हैं की प्रकृति और पर्यावरण का क्या होगा। सभी से कहना सिर्फ़ इतना है की अपने भविष्य का ध्यान रखते हुए यह करे की यदि एक पेड़ कांटे तो कहीं भी उचित स्थान देखकर एक पेड़ लगा अवश्य दे और उसकी देखभाल करे। यदि आपको कहीं जगह नही मिलती तो किसी मन्दिर में पेड़ लगवा सकते हैं।

Tuesday, August 19, 2008

आप भी खाए - मोदक


मोदक, गणेश जी को बड़े प्रिय हैं। मोदक दो तरह से बनाए जाते हैं। एक तो मावे यानि खोवे के और दूसरे के केवल मेवे के। मैदे को मोयन डालकर कड़ा गूंथ लें। मावे को भूँजकर उसमे स्वादानुसार शक्कर मिला लें। उसी में इलायची पावडर डालें। मैदे की छोटी-छोटी लोइयां बनाकर बेल लें। एक पुरी में, एक चम्मच भरावन रखकर मोदक का गोल आकार दें। घी में डीप फ्राय करें। मेवे के मोदक बनाने के लिए काजू, बादाम, पिस्ता बारीक़ काट लें। कढाई में एक चम्मच घी डालकर कटे मेवे चिरौंजी और किशमिस डालें। स्वादानुसार शक्कर डालकर मिलाये। बिली हुई पुरी में एक चम्मच भरावन भरकर मोदक की तरह गोल कर लें और डीप फ्राय कर ले। भोग लगाकर ही खाएं।

Monday, August 18, 2008

त्यौहार का महत्त्व


आज़ादी का पर्व और रक्षाबंधन का पर्व दोनों मन गए। खुशी से हमने मिठाइयां बाटी और खा भी लीं। अब देखें इन दोनों में समानता कहा है। वैसे देखा जाय तो दोनों ही हमें बांधने का , जोड़ने का काम करते हैं। स्वतंत्रता दिवस सारे देश को एक सूत्र में बाँधता है और रक्षा सूत्र एक व्यक्ति से व्यक्ति को आपस में जोड़ता है। इस प्रकार दोनों ही पर्व सभी को जोड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं। पर्वों का प्रमुख उद्देश्य सभी को प्रेम की एक श्रंखला में बांधना है। हमारे देश में अनेक भाषाओँ का प्रयोग करने वाले रहते हैं। वे अलग -अलग पर्व एक साथ मिलकर मानते हैं। जिसका मूल उद्देश्य प्रेम बढ़ाना और एकता में बांधना है। प्रेम और भाईचारे के ये पर्व इसी प्रकार हर्षोल्लास से मनाये जाए इसी आशा के साथ जयहिंद, रक्षा बंधन की शुभकामनायें।

Tuesday, August 12, 2008

अपनी गलती मानना - बड़ी बात है - - -

हमारा स्वभाव ही ऐसा है की हम नित नई गलतियाँ करते हैं और उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। अपने दोषों को पहचानना और उन्हें दूर करना यही सुखी जीवन का फंडा है । हम जो ग़लत करते हैं उसे स्वीकार करना ही सबसे अच्छी बात है। जो गलती करे और माने नही वह अंधकार में घिरता जाता है। जो गलती करके दोहराता जाता है वह दोषों के महाजाल में फंस जाता है। बुरे विचारो को जल्दी ही मन से हटा दे, अपनी गलती मानकर उसे सुधारने का प्रयास करें। अच्छा व्यवहार एक अद्भुत कला है जिसे हर कोई सीख सकता है। दूसरों के दोष न ढूंढकर अपने दोष देखना साहस का कार्य है। उस दोष को दूर करना ही महानता है। अपनी गलतियाँ माने और उनसे सीखें।

Monday, August 11, 2008

सीखें 'स्व' का सम्मान करना

कोई भी व्यक्ति तभी सफल हो सकता है जब उसे स्वयं पर भरोसा होता है। अपना सम्मान करने वाले ही हर क्षेत्र में सफलता पूर्वक आगे बढ़ते हैं। यह देखा गया है की जो ख़ुद का सम्मान नही करते वे न तो स्वयं सफल होते हैं, न ही दूसरे को सफल होने देते है। इसी को दूसरे शब्दों में आत्मविश्वास कहते हैं। आत्मविश्वासी बड़ी से बड़ी कठिनाई को आसानी से हल कर लेता है। वह किसी से इर्ष्या नही करता और सभी की मदद करने का प्रयास करता है। जो ख़ुद को नही पहचान पाते वे हमेशा असमंजस में रहते हैं। क्या करें, क्या न करें की स्थिति में वह भटकते रहते है। अपनी अन्दर की क्षमताओं को बिना पहचाने जो भी कार्य संपादित किए जाते हैं ,उनमे निष्कर्ष पर प्रश्न चिह्न लग जाता है, इसलिए स्वयं की क्षमताओं को पचंकर, आत्मविश्वास के साथ आगे बढे , सफलता आपके हाथ होगी।

भजिये




बारिश के मौसम में भजिए खाने का मज़ा ही निराला होता है। गरम-गरम भजिये और चटपटी चटनी मिल जाए तो क्या कहने। रोज़ तो आप गिलकी, लौकी, बैगन, आलू और प्याज़ के भजिये खा सकते हैं। पर जब व्रत होते हैं तब क्या बनाए की समस्या होती है। व्रत में सिंघाडे के आटे का घोल बनाकर आलू, गिलकी और लौकी के भजिए बनाए जा सकते हैं। अपनी सुविधानुसार आप फलाहारी नमक , जीरा, काली मिर्च, हरा धनिया का प्रयोग कर सकते हैं। इसी प्रकार तलने के लिए मूंगफली का तेल या घी भी इस्तेमाल कर सकते हैं। चटपटी चटनी बनने के लिए एक मुट्ठी मूंगफली को तवे पर सेक लें, उसमे छोटा चम्मच जीरा, ४ हरी मिर्च, नमक, छोटा चम्मच शक्कर, एक चम्मच नीबू का रस डालकर पीस लें। मजे लेकर खाएं।

Saturday, August 9, 2008

मन का दर्पण हैं आँखें


आँखें वह सब कह देती हैं जो ज़बान कहने में हिचकती या चुप रह जाती है। जो कहा जा रहा है कितना सही है, कितना ग़लत , यह भी आंखों से दिख जाता है। मानसिक एवं संवेदनात्मक भावों का विवरण आंखों के द्वारा विस्तार से मिल जाता है। आपको आंखों को पढने की कला आना चाहिए। आंखों में झाँकने का अर्थ है, मन का आंतरिक परिदृश्य देखना। आंखों की मूकभाषा आंतरिक द्वंद को उजागर कर देती है। दुःख और खुशी, दोनों ही भावो को आँखे अलग- अलग अंदाज़ में बयां करती है। पसंदीदा वास्तु को देखते ही आँखें फ़ैल जाती है और नापसंद की वास्तु को देखते ही सिकुड़ जाती है। वैज्ञानिक आधार पर भी यह सिद्ध किया जा चुका है कि yuvतियों कि आँखों की पुतलियाँ कुछ चौडी होती हैं।

Thursday, August 7, 2008

बॉडी लैंग्वेज यानि देहभाषा

जब मानव ने अपने विचारों का आदान - प्रदान आरम्भ किया तो संकेतों , इशारों के द्वारा ही कियाधीरे-धीरे शब्दों का विकास हुआ और देहभाषा का प्रयोग कम होने लगाजब शब्द निष्प्राण हो जाते हैं, तब शारीरिक हाव -भाव से ही बात समझाई जाती हैजब बच्चा जन्म लेता है तो उसके पास कोई शब्द नहीं होते, उसके हाव-भाव से माँ सब समझ लेती हैमाँ और बच्चे का यह संप्रेषण पूर्णतः निर्भाषिक होता हैइसी देहभाषा का पुनर्जन्म बॉडी-लैंग्वेज के रूप में हुआ हैपिछले पॉँच- दशको पीछे मुड़कर देखें तो देहभाषा के बारे में मनोवैज्ञानिकों ने विश्लेषण किएनिष्कर्ष यह निकल कर आया की देहभाषा का प्रभाव शाब्दिक संप्रेषण से लगभग आधा होता हैहमारे वार्तालाप का साठ प्रतिशत भाग अशब्दिक ही होता हैदृष्टिहीन और मूकबधिर संकेतों और ध्वनी के माध्यम से ही संचार करते हैहमारे आंतरिक भाव भी हम देहभाषा द्वारा दर्शाते हैंमुस्कराहट, क्रोध तथा दुःख भी बिना शब्दों के ही दर्शाया जाता है

Monday, August 4, 2008

निंदा

निंदा यानि बुराई ऐसा तपता स्वाद है जिसे हर कोई रस लेकर सुनता है। कई बार तो ऐसा होता है की व्यक्ति न जानते हुए बुराई करने लगता है। बोलते हुए उसे ध्यान ही नही रहता कि वह जिन बातो को रोचक बना कर बोले जा रहा है वह वास्तव में निंदा है। अक्सर ऐसा होता है कि हम किसी कि प्रशंसा करते -करते निंदा करने लगते हैंj और हमें पता ही नही चलता। । लेकिन जब कोई वार्तालाप निंदा काi रूप ले लेता है तो वह काँटों की तरह चुभने लगता है । निंदा को बीमार मानसिकता का पर्याय मन जाता है। बुराई करने से पहले यह विचार कर ले की क्या आप स्वयं उन बुराइयों से बचे हुए हैं। निंदा करने वाले भूल जाते हैं की वे भी उन्ही में से एक है। कुछ लोग बड़े महँ निंदक होते है। बिना बुराई किए उनका दिन नही गुजरता। जब तक किसी की बुराई न कर ले खाना हजम नही होता। ऐसे लोगो के यहाँ जमावडा लगा रहता है। कुछ लोग सुनने और कुछ लोग सुनाने को बेताब रहते है। जो लोग दूसरों की बुराई करने में मजे लेते हैं, उनका व्यक्तित्व विकृत होने लगता है। न तो वे स्वयं खुश रहते है और न औरो को खुश रहने देते हैं। ऐसे लोग समाज में बुराइयाँ फैलाते हैं। ऐसे लोगो को सुधरने के लिए उनका दिमागी विश्लेषण किया जन जरुरी है। उन्हें कार्यो में व्यस्त rkhakar अच्छे vicharo से उनका brain wash करना होगा तभी समाज में अच्छी मानसिकता का vikas होगा । निंदक से नही prashanshak से smaj आगे बढ़ता है। इसलिए निंदक नही prashansak बने।

Sunday, August 3, 2008

सम्मान

घर हो या बाहर सभी सम्मान पाना चाहते हैं। सम्मान पाने के लिए सम्मान देना भी बहुत जरुरी है। हमारे धर्मग्रन्थ बताते हैं कि सम्मान न देने के कारण महाभारत जैसे वीभत्स युद्ध हुए। दुर्योधन ने अपने भाई पांडवों को सम्मान नही दिया, द्रौपदी ने आपा खो दिया और दुर्योधन को अंधे का पुत्र अँधा कह दिया। dउर्योधन ने भरी सभा में अपनी भाभी का अपमान किया। पूरा खानादान baदले कि आग में जलकर स्वाहा हो गया। सम्मान पाने के चक्कर में सब एक-दुसरे के दुश्मन बनते गए।

दूसरी ओर रामचरित मानस में मंथरा कि कथनी और कैकेई कि जिद से राम को वन जाना पड़ा। परन्तु किसी ने भी किसी का अपमान नही किया। जो जिस सम्मान के लायक थे उन्हें वह सम्मान सभी ने दिया। परस्पर स्नेह बनाए रखने के लिए सभी ने परिस्थितियों का सामना करते हुए, सम्मान बनाए रखा। हमें अपने माता-पिता, शिक्षक, बड़ों और छोटों सभी का सम्मान करना चाहिए जिससे हमें सम्मान मिले।

किशोर कुमार


फ़िल्म संगीत और अभिनय की दुनिया का जाना पहचाना नाम है किशोर कुमार। किशोर कुमार ने गायिकी और अभिनय के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ा। आज अगर वे होते तो संगीत को और भी अनोखे अंदाज में पेश करते। उनके परिवार में दो बेटे और पत्नी लीना चंद्रावरकर हैं। किशोर दा के दोनों बेटे भी गायक हैं। ४ अगस्त १९२९ को खंडवा में जन्मे किशोर दा को आज सारा संगीत जगत श्रद्धांजलि दे रहा है।

Saturday, August 2, 2008

मित्रता दिवस


आज मित्रता दिवस है। सभी को शुभकामनाए। दोस्ती वह सम्बन्ध है जो हर रिश्ते से बढ़कर है। इसे निभाना दोनों दोस्तों की आपसी समझ पर निर्भर है। सच्ची दोस्ती वाही है जो बिना किसी प्रतिफल की आशा से की जाती है। दोस्ती में एक दूसरे की भावनाओं को समझकर व्यवहार किया जाता है। दोस्त का दर्द बिना कहे ही जो समझ ले वाही सच्चा दोस्त है। यदि किसी शंका वश मनमुटाव पैदा हो जाए तो उसे तत्काल ही दूर कर लेना चाहिए। पहले आप- पहले आप के चक्कर में नही पढ़ना चाहिए।

Friday, August 1, 2008

मध्यप्रदेश का शिमला - पचमढ़ी


दोस्तों यह पचमढ़ी है।
पॉँच है गुफाए यहाँ , पहाडियां अनगिनत । हमने हर पहाडी चढ़ी है। दोस्तों यह पचमढ़ी है। पॉँच है मढिया यहाँ , घाटियाँ अनगिनत, हमने हर घटी चढी है, दोस्तों यह पचमढ़ी है। ऊँची- ऊँची पहाड़ी चढ़कर, नज़ारे को नज़र करने, सूरज ने अनगिनत सीढियाँ चढी है। दोस्तों यह पचमढ़ी है। झरनों की सरगम में, तन-मन थिरकाने kओ , एक -दूसरे में होड़ लगी है। दोस्तों यह पचमढ़ी है। सूरज भी वाही है, चंदा भी वाही है, बस रौशनी नई- नई है। दोस्तों यह पचमढ़ी है। सूरज को सीढियों से चढ़ते देखा, दबे पाँव उसे उतरते देखा। चढ़ने- उतरने कीbazई लगी है। दोस्तों यह पचमढ़ी है। मानव के पूर्वज , ढेरों है यहाँ , जीवन की सरगम में , राग नई chhidhi है, दोस्तों यह पचमढ़ी है। पदों के नीचे से , पहाडो के पीछे से सूरज niklne और doobne से sanso की सरगम और badhi है। दोस्तों यह पचमढ़ी है।

Wednesday, July 30, 2008

जयंती/पुण्यतिथि



साहित्य सृजन को धरातल देने वाले प्रेमचंद को सभी जानते हैं। उनके लेखन ने समाज को जो सीख दी वह आज भी कारगर है। उन्होंने नाटक, कहानियाँ और उपन्यास जो भी लिखे, उनमे मानव जीवन की वास्तविकताएँ व्यक्त की। अपने जीवन के ५६ वर्षों में प्रेमचंद जी ने अपनी प्रगतिशील लेखनी के सुनहरे रंग बिखेरे, जो आज भी उतने ही प्रभावशाली हैं, जिनते रचना के समय रहे। नमन है ऐसी महान कलम को जिसने जीवन को दिशा दी और पाठकों को संतुष्टि।


आज ३१जुलाई kओ भारतीय संगीत जगत के एक अध्याय कहे जाने वाले मोहम्मद रफी का पुन्य स्मरण जरुरी है। संगीत की कोई भी महफ़िल उनकी आवाज दस बिना सूनी रहती है। २५ हजार से भी अधिक गीत गाने वाले रफी हिन्दी फिल्मी संगीत के क्षेत्र में ऐसे महान गायक थे जिन्होंने हर तरह के गीत गाकर ख़ुद को अमर कर दिया । आज वो हमारे बीच नहीं है पर उनके गीत सदा हमारे साथ रहेंगे।

Tuesday, July 29, 2008

भविष्य की चुनौतियाँ

प्राचीनतम भारतीय सभ्यता अब केवल रूम डेकोरेशन का सिम्बल बनती जा रही है। प्रत्येक सौ - दो सौ वर्षों में विश्व में परिवर्तन होते आए हैं। इन परिवर्तनों से समाज और देश में बहुत से सुधार भी हुए। समाज की उत्तरोत्तर उन्नति के साथ ही क्रमिक विकास हुआ। अनेक आविष्कार हुए। पहनने, खाने, निर्माण करने और मनोरंजन के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र मे भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। समाज का सबसे बड़ा वर्ग 'युवा वर्ग ' इससे आसानी से प्रभावित हुआ। नित नए आविष्कारों से आकर्षित होकर 'युवा वर्ग' आधुनिकता मे लिप्त होने लगा। इससे उसकी याददाश्त और कार्य करने की क्षमता दोनों मे ही असर पड़ा। नवीन तकनीकों पर हद से ज्यादा आश्रित होने से उसकी मेमोरी क्षीण होने लगी। माउस के एक क्लिक से मनचाही जानकारी की उपलब्धता उसकी कमजोरी बनने लगी। उसकी शारीरिक क्षमताओं पर भी विपरीत प्रभाव दिखाई देने लगे। ज्ञान और शक्ति के साथ यदि शारीरिक बल , विकसित होने के बदले कम होने लगे तो निश्चय ही यह चिंता का विषय है। अपने बौध्दिक बल और स्वस्थ शरीर को दृढ़ बनाएं तथा आधुनिक तकनीकों के प्रयोग के बाद व्यायाम अवश्य करें।

Monday, July 28, 2008

हँसी सेहत के लिए वरदान है

कोई हँसता दाँत दिखाकर, कोई मुख हाथ रखे। किसी ने केवल होंठ हिलाए, चाहे तुमको हँसी लगे। हँसना इक अच्छी भाषा है, थोड़े में बहुत कहे। हंसते-हंसते रो पड़ते कुछ, लगता जैसे दर्द सहे। कोई सपने देख के हँसता, कोई बीती याद करे। कुछ तो हंसने से भी डरते, जैसे कोई पाप करे। हंसो-हंसो और खूब हंसो, हँसना जीवन का आधार। रोते जीवन नहीं कटेगा, हो जाओगे तुम बीमार। हँसना जीवन काल बढाए, चाहो तो मनो इक बात। हँसते-हँसते बूढे हो गए, जिनके गिर गए पूरे दाँत। लोट-पोट होकर जो हँसते, उनकी देखो सेहत न्यारी। खूब चैन की नींद हैं सोते, पास न आ पति बीमारी।

Sunday, July 27, 2008

बड़ा अनोखा है - रंगों का संसार

रंग चाहे इन्द्रधनुष के हों या फूलों के आकर्षित कर ही लेते हैं। रंगों की अलग-अलग पहचान है। हर रंग की अपनी छवि निर्धारित सी है। रंगों के क्रम का भी विशिष्ट स्थान है। देवताओं और सामान्य मनुष्य के लिए रंगों का प्रभाव और महत्त्व भिन्न हो सकता है। अपनी पसंद के अनुसार ही हम रंगों का चयन करते हैं, परन्तु सभी रंगों का वैज्ञानिक प्रभाव हम पर पड़ता है। बै, जा , नी , ह, पी,ना , ला - यह इन्द्रधनुष के रंगों की श्रंखला है। बैगनी रंग आशा से परिपूर्ण
आदर और मर्यादा का रंग है। इसी रंग के karan हम bhavnatmak judav का अनुभव करते हैं। इसी से मिलता julta रंग है jamuni जो shalinta को darshata है। नीला रंग ललित kalaon
की or ingit करता है। यह रंग मन को sukun देता है। नीला रंग सेवा भाव को भी दर्शाता है। प्रयुक्त किया जाता है विवाह पूजा आदि। के लिए पीले रंग का चुनाव अच्छा मन जाताहै जाताहै जाताहै है। पीला नारंगी रंग देवताओं . देवताओं देवताओं देवताओं में प्रयुक्त किया जाता है । विवाह पूजा आदि के लिए पीले रंग का chunav achchha mana jatahai। narangi rang devtaonkamana जाता है । narangi रंग sansarik शक्ति को दर्शाता है . लाल रंग sundarta का prateek mana जाता है

Saturday, July 26, 2008

आवश्यकता

आवश्यकता, आविष्कार की जननी है . इन आवश्कताओं से नवीन विधियों का जन्म होता है। शिक्षा हमारे जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। जो हमारा सर्वांगीण विकास कराती है। शिक्षा प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं होती। फ़िर भी यह निर्धारित किया गया है की ५-६ वर्ष की उम्र से शिक्षा का आरंभ होना चाहिए। बाल्यकाल में दी गई शिक्षा प्रभावी और स्थायी होती है, किंतुयदि किसी कारणवश व्यक्ति उस समय शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता तो जब भी मौका मिले उसे अध्ययन में लग जन चाहिए। आजादी के बाद से हमारे देश की सरकार ने शिक्षा सम्बन्धी अनेक योजनाएं चलाई और आज भी चलाई जा रही हैं। आवश्यकता है आपको आगे आकर उसे ग्रहण करने की। यदि एक आम पढ़ा लिखा नागरिक दो व्यक्तियों को शिक्षित करने का बीडा उठा ले तो निश्चय ही देश तरक्की करेगा।

भोजन

वैसे तो हर व्यक्ति अपनी ही पसंद का खाना चाहता है। परन्तु कभी उसे दूसरों के मन का खाकर संतोष करना पड़ता है। मानव स्वभाव से तो शाकाहारी प्राणी है, फ़िर भी शौक और स्वाद के लिए वह मांसाहार का सहारा लेने लगता है।
मांसाहार एक दृष्टि से जीवहत्या का पर्याय मन जाता है। मांसाहार न तो समग्र आहार है और न ही पूर्ण पौष्टिक। बिना सब्जी, दल, दूध और दही के शरीर की जरूरतें पूरी नहीं होती। मांस में अनेक इसे हानिकारक तत्व होते हैं जो शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। अतः अपने स्वाद की पूर्ति के लिए स्वयं को बीमार न बनाए और जीव हत्या करने से बचें।

Thursday, July 24, 2008

हस्ताक्षर

व्यक्तित्व का दर्पण होते हैं। व्यक्ति के हस्ताक्षर से उसके व्यक्तित्व का शब्दशः अंदाजा लगाया जा सकता है। सुंदर और आकर्षक हस्ताक्षर से ऐसा जान पड़ता है की व्यक्ति सुलझा हुआ और सज्जन है। परन्तु कभी- कभी हस्ताक्षर से लोग धोखा भी खा जाते हैं। कई सुंदर और चुटीले हस्ताक्षर करने वाले चालक और जालसाज भी हो सकते हैं। इसका उल्टा है कि टेड - mede aur कुरूप हस्ताक्षर करने वाले भी साहसी और उदार होते हैं। अस्पष्ट और अपठनीय हस्ताक्षर अच्छे नहीं समझे जाते।

संशय दूर करें

अवसाद, एक रोग बनता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण hamari अति vyastata है। हमारा शरीर एक drishyman sanstha है । शरीर और मन me अन्तर है । मन दिखाई नहीं देता पर वह शरीर से jyada majboot होता है । यदि यह मन किसी शंका से ghir जाए to उसे शंका का makadjal अपने me uljhata jata है। इसलिए शंका का निवारण turant करें।

प्रेम सीखें पक्षियों से

भारतीय संस्कृति में सदा से पशु और पक्षी पूजनीय रहे। आज भी हम ईश्वर को जिस भी रूप में पूजें, कोइ न कोई पशु या पक्षी उनके साथ होता है हमारे धर्म ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में पशुओं और पक्षियों के दिव्या चक्षुओं की व्याख्या की गई है। इन जीवों के प्रेम और स्नेह का अंदाज अनोखा है। बिना किसी भेदभाव के वे हमारे मित्र बनकर हमारी सहायता करने को तत्पर रहते हैं। फ़िर हम क्यों अपना कर्तव्य और धर्म से भटक रहे हैं। हमें भी उनसे प्रेरणा लेकर स्नेह और सौहार्द से मिलकर रहना चाहिए।

Tuesday, July 22, 2008

स्मरण




आज २३ जुलाई वह दिन है, जिस दिन भारत माता के दो महान सपूत जन्मे। इन शहीदों ने अपने लहू का हर कतरा देश की आजादी की लडाई में बहा दिया। फलस्वरूप १५ अगस्त १९४७ को देश आजाद हो गया। हम उन अमर शहीदों को श्रद्धा नमन् करते हैं। लोकमान्य बाल गंगाधर ने देश को एकजुट होकर उत्सवों के माध्यम से सहेजा। चंद्र शेखर आजाद ने दुश्मन की गोली से न मरने की अपनी कसम को निभाया।

समीक्षा

कवि दुष्यंत कुमार का गजल संग्रह 'साये में धूप' अवश्य पढ़े। अति सरल भाषा में लिखी उनकी रचनाए बरबस ही आकर्षित कर लेती हैं। गंगा की समस्याओं से प्रेरित हो कवि ने पेज ३० पर जो पंक्तियाँ लिखी हैं - उनमे देश की अन्य समस्याओं का दर्द समाहित है। उन्हीं की चंद पंक्तियाँ हैं -

एक कबूतर , चिट्ठी लेकर, पहली- पहली बार उड़ा। मौसम एक गुलेल लिए था पट से नीचे आन गिरा।
बंजर धरती, झुलसे पौधे, बिखरे कांटे तेज हवा, हमने घर बैठे -बैठे ही सारा मंजर देख लिया।
चट्टानों पर खड़ा हुआ तो छाप रह गई पावों की, सोचो कितना बोझ उठाकर मै इन राहों से गुजरा।
सहने को हो गया इकठ्ठा इतना सारा दुःख मन में, कहने को हो गया की देखो अब मैं तुमको भूल गया।
धीरे -धीरे भीग रही हैं साडी ईंटे पानी में, इनको क्या मालूम की आगे चलकर इनका क्या होगा।

Monday, July 21, 2008

बात पकड़ की ----

किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने के लिए जरुरी है, लक्ष्य का निर्धारण, इसके बाद बात आती है उसे प्राप्त करने की। अपने निर्धारित लक्ष्य को पाने हेतु ,लगन और विश्वास के साथ मेहनत भी उतनी ही जरुरी है। डटे रहो।

स्वागत * * * * *

करते आज तुम्हारा स्वागत, मेरे नेह पधारो।
करुणा के बिखरे इस क्षण में, जीवन ज्योत जगाओ।
उमड़ -घुमड़ आशाओ के घन, पथ में बाग लगाओ।
मधुरा कलरव तरुण पल्लवित, सौरभ गीत सुनाओ।
कनुप्रिया के सजल चक्षु में, मिलन के भाव जगाओ।
नूपुर सी झनके तरुनाई, ऐसा राग सुनाओ।
स्वागतम * * * * * *

देश की माटी

देश की माटी , माथे लगाकर , धरती की समता का ओढे दुशाला।
पीड़ा को हराने का, खुशियाँ बढ़ाने का, हिलमिलाता सा स्वप्न है मैंने पाला।
स्वागत है उनका जो इसे स्वीकारे,उनका भी स्वागत है जो इससे हारे।
हाथो में हाथ ले साथ देना होगा, इंसा को इंसानियत से मिलाना ही होगा।
जयहिंद !