Monday, September 28, 2009

एक और रावन जल गया

एक और रावन जल गया।
अंदर का नही, बाहर का।
वर्षों से इसी तरह, जलाया जा रहा है।
जल रहा है अविरल,
उसका अन्तःकरण, देखकर,
बलात्कार, भ्रूण हत्या,
बढ़ते भ्रष्टाचार,
मौन है फ़िर भी,
सुलग रहा है ,भीतर ही भीतर।
बाहर का दैत्य जलाया जा रहा है,
एक अदृश्य दैत्य द्वारा,
नही दिख रहा किसी को ,
नंगी आंखों से भी।
समाज का वह रावन,
जो छीन रहा है,
बालमन ki कोमलता,
बचपन के खिलौने।
थमा रहा है, एक लुप्त हथियार।
कैसे बचे? bikhrta बचपन?
कैसे मरे अंदर का रावन?


Monday, August 31, 2009

४४ बसंत


छवि जोड़ेंबीत गए एक-एक कर,
जीवन के ४४ बसंत
हर दिन, हर पल कुछ नया संजोया,
मिला नहीं पर कोई अंत
ढूंढ रहे थे नयन मगन हो,
एक अनवरत सत्य जो,
लघु, दीर्घ और अतिदीर्घ है,
यह यात्रा अविरल अनंत
मूल्यों का संग्रह रहा,
हर पग पर आता-जाता
कभी निभाया,कभी निपटाया,
सहज, सरल मन को भाता
फ़िर आया एक नया शगूफा,
छेड़ गया मन का दर्पण
रोया, छटपटाया कितना,
सुना गया स्वर क्रंदन
एक समय ऐसा भी आया,
भटक गया जब मन ऐसा
नहीं रुका गतिरोध ह्रदय का,
सब प्रतिरोध व्यर्थ गया.


Sunday, August 23, 2009

उनका प्रेमविवाह

उन्होंने कर लिया है,
अपनी मर्जी से प्रेमविवाह।
मुझे बताना जरुरी नही समझा,
सुना है दोनों साथ सो रहे हैं।
आते-जाते साथ है,
साथ घूम रहे है।
काश की हम, हमसफ़र हो जाते,
जहाँ वो जाते, हम भी पहुँच जाते।
उन्होंने हमें मौका नही दिया,
वरना हम भी पीछे पड़ जाते।
फोन पर भी उनके रहता है पहरा,
हंसने पर लगा है, प्रतिबन्ध गहरा।
मेरी तो शामत है, उनका प्रेमविवाह,
चाहे कुछ समय के लिए हो,
पर गहरा है विवाद।
अब तो ऊपर वाला ही मालिक है,
न जाने कब तलाक की तारिख है.

Monday, August 17, 2009

जयपुर


सचमुच यह पिंक सिटी है.यहाँ की भीनीं बारिश और साफ-स्वच्छ सड़कों ने मुझे घूमने पर मजबूरकर दिया। मैंने यूनिवर्सिटी से लालकोठी, अजमेरी गेट,चिडियाघर,नेहरू बाज़ार,बिरला मन्दिर तथा गणेश मन्दिर देखा। बाकि कल बताउंगी.

दूसरा सप्ताह


आज हमारे रेफ्रेशेर कोर्से का दूसरा सप्ताह शुरू हुआ। ओमप्रकाश शर्माजी ने पहले शेशन में ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो और मीडिया की उपयोगिता पर चर्चा की। फ़िर आए अलोक पुराणिक ब्लॉग की नई और महत्वपूर्ण संभावनाओं के साथ। उन्होंने हमें ब्लॉग बनने से लेकर कमेन्ट लिखने तक की पूरी कार्यप्रणाली समझाई। अब हमारे नॉन मीडिया साथी भी ब्लॉग बना सकेंगे। स्वाधीनता दिवस की बधाई के साथ.

Wednesday, July 22, 2009

मेरा सृजन


कहाँ है मेरा सृजन?
क्या उसे भी रौंध डाला,
उस मशीनी दैत्य ने?
फूलने से पूर्व ही,
फूल से पूछा नहीं,
क्या तुझे भी देखना है दुनिया?
उससे भी पहले जांचकर,
जान ली उसकी दशा।
बाल है या बालिका?
अंश है मेरा सृजन,
उसे भी आने दो यहाँ,
वंश है मेरा सृजन.

Saturday, July 18, 2009

कोहरे की ओट में



कोहरे की ओट में दिखा, एक आशियाना।
कुछ पास आता, कुछ दूर जाता।
नन्हे क़दमों से आगे को बढ़ता,
फ़िर तेज़ क़दमों से पीछे को जाता।
कभी कुछ कहता, कभी गुनगुनाता,
हौले से आकर, सर्र से उड़ जाता।
उसी के पीछे हो लिया है मन,
न जाने अब कहाँ है जाता।
एक बार सोचा रूककर पूछूं,
बिछड़ने के डर से, मन डर जाता।
कहीं लौट जाए न, पास आती खु शियां।
दूर हो न जाए, मेरा आशियाना।