Friday, January 15, 2010

प्रश्न



पहुँच गई है पतंग वहाँ पर, भेज चाहा उसे जहाँ पर।


जाकर उनसे पूछ रही है, क्या मै पहुंची सही जगह पर?


क्या मै वह सब कह पाऊँगी ? जो चाहा है मन ने कहना,


कब मै वह सब कह पाऊँगी , चाहा है जो दिल ने कहना?


ठहर गई है पतंग वहीँ पर, भेजा था उसे जहाँ पर।


क्या फिर खुशियाँ मुझे मिलेंगी?


क्या इस धरा पर जीवन होगा खुशहाल?


कब बदलेंगे ये बदहाल?


?



Thursday, January 14, 2010

मन की पतंग


मन की पतंग को सांसों की डोर से बांधकर,
छोड़ दिया है खुले आकाश में,
शायद जा पहुंचे गंतव्य पर?
हो सकता है मेरा लक्ष्य, तुम्हारे से अलग हो?
हो सकता है वही हो, जो मेरा है?
तुम मेरे सफ़र के सफल होने की प्रार्थना करना,
मै तुम्हारे लिए दिल से दुआ करूंगी।
डोर मजबूत बांधना , कहीं हवा के थपेड़ों से खुल न जाए!

उत्साह


हम क्या चाहते हैं?

जो कहना वो कह नही पाते,

जो लिखना वो लिख नही पाते,

जो बनाना वो बना नही पाते ,

जो दिखाना वो दिखा नही पाते,

जहाँ जाना वहन जा नहीं पाते,

आखिर कब ख़त्म होगी यह आपाधापी की दौड़?

इसी की तलाश है,

कभी तो समय हमारा होगा,

जब हम जो चाहेंगे वो कहेंगे,

जिससे चाहेंगे उससे कहेंगे,

जो चाहेंगे वो लिखेंगे,

जिसे चाहेंगे उसे सुनायेंगे,

जो चाहेंगे वो दिखायेंगे,

जिसे चाहेंगे उसे दिखायेंगे

यही तो जीने का उत्साह है * * * *





Saturday, October 24, 2009

आ गई ठण्ड


डाल दिया है मैंने उनका स्वेटर।

बुन रही हूँ, धीरे-धीरे।

हो जाएगा पूरा, उनकी यादों के सहारे।

जब वे लौटेंगे, तब देख के हैरान होंगे।

कैसे बना लिया तुमने मेरे बिना?

वो क्या जाने उनके हर अंग का नाप,

बसा है इन आँखों में।

जो बुन रहा है ख्वाब अनगिनत।

दिख रहा है, बस स्वेटर बुनता।

कल तक गला भी पूरा बन जाएगा।

उस बार की तरह नही होगा छोटा।

तब मन विचलित था, जब उसे बुना था।

नींद भी नही थी चैन भी नही था।

अन्दर के महाकुम्भ की गर्मी,

बाहर की ठण्ड से भयावह थी।

अब आ रहा है , चैन का संदेसा।

आज पूरा हो जाएगा इन्तज़ार का सफर।

आएगी जब ठंडी बयार,

ढक लूंगी में मन से तन,

आ जायेगी गर्मी फ़िर से, दूर करेगी ये ठिठुरन।




Monday, September 28, 2009

एक और रावन जल गया

एक और रावन जल गया।
अंदर का नही, बाहर का।
वर्षों से इसी तरह, जलाया जा रहा है।
जल रहा है अविरल,
उसका अन्तःकरण, देखकर,
बलात्कार, भ्रूण हत्या,
बढ़ते भ्रष्टाचार,
मौन है फ़िर भी,
सुलग रहा है ,भीतर ही भीतर।
बाहर का दैत्य जलाया जा रहा है,
एक अदृश्य दैत्य द्वारा,
नही दिख रहा किसी को ,
नंगी आंखों से भी।
समाज का वह रावन,
जो छीन रहा है,
बालमन ki कोमलता,
बचपन के खिलौने।
थमा रहा है, एक लुप्त हथियार।
कैसे बचे? bikhrta बचपन?
कैसे मरे अंदर का रावन?


Monday, August 31, 2009

४४ बसंत


छवि जोड़ेंबीत गए एक-एक कर,
जीवन के ४४ बसंत
हर दिन, हर पल कुछ नया संजोया,
मिला नहीं पर कोई अंत
ढूंढ रहे थे नयन मगन हो,
एक अनवरत सत्य जो,
लघु, दीर्घ और अतिदीर्घ है,
यह यात्रा अविरल अनंत
मूल्यों का संग्रह रहा,
हर पग पर आता-जाता
कभी निभाया,कभी निपटाया,
सहज, सरल मन को भाता
फ़िर आया एक नया शगूफा,
छेड़ गया मन का दर्पण
रोया, छटपटाया कितना,
सुना गया स्वर क्रंदन
एक समय ऐसा भी आया,
भटक गया जब मन ऐसा
नहीं रुका गतिरोध ह्रदय का,
सब प्रतिरोध व्यर्थ गया.


Sunday, August 23, 2009

उनका प्रेमविवाह

उन्होंने कर लिया है,
अपनी मर्जी से प्रेमविवाह।
मुझे बताना जरुरी नही समझा,
सुना है दोनों साथ सो रहे हैं।
आते-जाते साथ है,
साथ घूम रहे है।
काश की हम, हमसफ़र हो जाते,
जहाँ वो जाते, हम भी पहुँच जाते।
उन्होंने हमें मौका नही दिया,
वरना हम भी पीछे पड़ जाते।
फोन पर भी उनके रहता है पहरा,
हंसने पर लगा है, प्रतिबन्ध गहरा।
मेरी तो शामत है, उनका प्रेमविवाह,
चाहे कुछ समय के लिए हो,
पर गहरा है विवाद।
अब तो ऊपर वाला ही मालिक है,
न जाने कब तलाक की तारिख है.