Sunday, July 12, 2009

सावन के झूले


सावन के झूलों का मौसम,

कब आता है,

कब जाता है?

अब ये केवल वही बताए,

जिसने वो झूला, झूला है।

हमने तो देखा है झूला,

हरदम चलता, बिजली से,

जब वो नही होती है,

तभी नही होता झूला,

पता नही सावन या भादों,

कभी सुना था,माँ- dअदि से,

सावन का वो झूला।

नीम-आम के ऊपर झूला,

रिमझिम - रिमझिम मेघ बरसते,

झूले पर सब गीत भी गाते,

लीना-नीना, कुसुम-माधुरी,

घंटों झूलों पर बतियाते।

अब तो आम-नीम नही अपने,

कहाँ बंधेगा झूला,

pजीवन की रक्षा करने को,

पढ़ लगाना होगा.




Friday, July 10, 2009


हाँ, मुझे भी याद है
तुम्हारा वह घर।
घर ही तो था,
ईंट को गारे से जोड़कर।
बनाया गया,
जिसमे मैंने पहली बार,
यह सोचकर कदम रखा,
की मिलेंगे कुछ जाने-पहचाने,
पर तुम्हे घेरे खड़े थे,
कुछ अनजाने,
जो तुम्हारे अपने थे, शायद!
मुझे घेरकर,
सोच रहे थे,
न जाने कौन है।
जब तुमने ,
लाकर दिया था,
वह नीला ,दुशाला,
देखा था मैंने,
तुम्हे कृतघ्न होकर।
तब शायद उनको,
विश्वास हुआ था,
मै भी हूँ तुम्हारी,
एक परछाईं!
छोड़कर सारी औपचारिकता,
तुमने मुझे वह दिया,
जो मैंने चाहा।
तब निर्णय किया,
अब मै ईंट -गारे के ,
इस घर को घर बनाउंगी।
जो मैंने पाया,
उसे बांटकर,
अपनी इस नन्ही दुनिया को ,
खूबसूरत बनाउंगी।







Tuesday, July 7, 2009

श्रावण मै स्वास्थ्य

सावन के महीने में हरियाली के साथ ही मौसम भी खुशनुमा हो जाता है। खट्टा-मीठा-चटपटा खाने को मन ललचाने लगता है। बारिश की फुहारों के साथ भजिये खाने का मज़ा ही निराला होता है। परन्तु खाने के स्वाद के साथ ही स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें। हो सके तो बरसात में पानी उबालकर पियें। जितनी भूख हो उससे एक रोटी कम ही खाएं। अधिक खाने और ज्यादा भूखे रहने से अनेक बीमारियाँ होती हैं पर कम खाने से कुछ बिमारिओं से बचा जा सकता है। उत्तम स्वास्थ्य ही हमारी पूँजी है।

श्रावण आया


श्रावण आया झूमकर, बारिश में भीगे हम सब।


धरती ने ओढी हरियाली, फैली है ये छटा निराली।


बिजली की चम-चम, बूंदों कि छम-छम।


बादल के गर्जन से , डरता है मेरा मन।


कब नदी भरेगी, सागर तक जायेगी?


मेरे मन का जल, भरकर ले आएगी।


सागर से मिलना ही, नदी का लक्ष्य है।


सबको जल देना, नदी का लक्ष्य है।



Friday, May 22, 2009

क्या तुम डरते हो

क्या तुम डरते हो, काले घनघोर अंधेरे से, इस जग के फेरे से।
क्या तुम डरते हो, गरजते बादलों से, कड़कती बिजली से।
क्या तुम डरते हो, उफनती नदी से, बहती हवा से।
क्या तुम डरते हो , गिरते झरने से, घिरते तूफान से।
क्या तुम डरते हो, ऊंचे पहाड़ से, चलते हिंडोले से।
क्या तुम डरते हो, लम्बी सड़क से, तेज़ रफ्तार से।
क्या तुम डरते हो,खतरनाक मोड़ से, दुर्घटना से।
क्या तुम डरते हो, सपनों से, हकीकत से।
डर-डर के जीना कैसा जीना है।
डर को मन से निकाल कर जीन ही जीना है।

Wednesday, May 13, 2009

इंतजार

इंतजार रहता है, हर किसी को किसी का।
भोजन का हो चाहे भजन का ।
आने का हो चाहे जाने का।
मिलने का हो चाहे बिछड़ने का।
सब इसी उदेड-बुन मै लगे है।
कब ख़त्म हो यह सिलसिला इंतजार का।
जन्म और मृत्यु का भी इंतजार होता है।
शादी और बर्बादी का भी होता है इंतजार।
परीक्षा की डेट का करते हैं इंतजार।
फ़िर करने लगते हैं इंतजार रिजल्ट का।
कब ख़त्म हो यह सिलसिला इंतजार का।
छुट्टी का इंतजार बेसब्री से होता।
फ़िर होता कालेज खुलने का इंतजार।
पार्टी का इंतजार हर समय है रहता।
उसके बाद आता उत्सव का इंतजार।
कब ख़त्म हो यह सिलसिला इंतजार का।
बस आने का इंतजार, टिकट मिलने का इंतजार।
बस मै बैठे तो स्टाप आने का इंतजार।
क्लास मै टीचर के आने का इंतजार।
टीचर का बोरिंग लेक्चर ख़त्म होने का इंतजार।
कब ख़त्म हो यह सिलसिला इंतजार का।
लिस्ट बहुत लम्बी है, इंतजारों की ।
कभी न ख़त्म होगा सिलसिला इंतजार का.

भीगा मन


आज पहली बार भीगा मन,
इससे पहले बस तन भीगा था।
चन्द फुहारों के छींटों से,
बादल की गिरती बूंदों से।
सर्द हवाएं बेकल करतीं,
गिरती बूंदों को बिखरातीं।
न जाने क्यूँ तन पर पड़ती,
मन को कभी नहीं छू पाई।
आज मगर वो बारिश आई,
एक अनोखा संदेश लाई
तन भीगा, मन भीग गया है,
कोई इसको जान न पाया।
मैंने क्या खोया क्या पाया?